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Wednesday, March 22, 2017

कल

डर कब लगता है?
जब कुछ खोने को हो।

कल मैं उससे एक साल बाद मिल रहा हूँ .
हम पिछले साल मिले थे।
सुनने में अच्छा लगता है, परी-कथा जैसी.
काश आम-कथा होती।

आज और कल के अंतराल में
ऐसा लगता है एक अर्सा झूल रहा है।
कल मैं कोई और होऊंगा, आज कुछ और।
अंत समीप आते देख, डर लग रहा है।

मुझे मृत्यु का भय है।
शायद भय से ज़्यादा शर्म।
मेरे मन में मौत सबसे बड़ी विडम्बना है:
एक पल आप पूर्ण रूपेण जीवित हो, और अगले ही पल पूर्ण रूपेण मृत।

इसलिए मैं कभी तैयारी के बिना नहीं मारना पसंद करूँगा।
मतलब महाशय घर से निकले थे ज़िन्दगी भर के ख्वाब ले कर,
पर बीच रास्ते अचानक मौत हो गयी।
आम तौर पर मैं अपनी मौत स्वीकार कर हर दिन जीता हूँ।

पर कल अपनी मौत के लिए मैं तैयार नहीं हूँ।
सोचते हुए शर्म आती है कि यदि अगले क्षण मैं मर गया, तो लोग अख़बार में headline पढ़ के कहेंगे,
'बेचारे ने मौत के ऊपर blog लिखा और मर गया'.

कल जैसे दिनों के लिए मैं जीता हूँ।

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